Sunday, October 27, 2013

चुनावी डंका :सेमीफ़ाइनल मैच



आगामी विधानसभा चुनावों में पाँच राज्यों की तस्वीर क्या होगी इसके कयास अभी से लगाने शुरू हो गए हैं | चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया पर भी आचार संहिता लागू कर दी है | देश में इस समय कई प्रकार की रैलियाँ हो रही हैं | एक तरफ राहुल गांधी मोर्चा संभाले हुए हैं तो दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी | पाँच राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए चुनावी बिगुल का आगाज हो चुका  है | दिल्ली, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और मिज़ोरम के लिए मतदान की तिथियाँ निर्धारित कर दी गईं हैं | छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 11 और 19 नवम्बर को वोट डाले जाएंगे | मध्यप्रदेश और मिज़ोरम में 25 नवम्बर, राजस्थान में 1 दिसम्बर, दिल्ली में 4 दिसम्बर को वोट डाले जाएंगे |
                                    पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों को सिंहासन के लिए सेमीफ़ाइनल कहा जा रहा है क्योंकि इसके तुरंत बाद ही लोकसभा चुनाव भी हैं | अगर आंकड़ों पर नज़र डाली जाए, तो ये चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं | इन पाँच राज्यों में 11 करोड़ मतदाता हैं | पांचों राज्यों में  कुल मिलाकर 630 विधानसभा सीटें हैं | अभी पाँच राज्यों में से तीन में काँग्रेस की सरकार है | इन पांचों राज्यों में कुल मिलाकर 73 लोकसभा सीटें   हैं | इस बार के चुनाव महत्त्वपूर्ण होने का कारण यह भी है कि पहली बार मतदाता को नोटा (उपर्युक्त में से कोई नहीं ) का अधिकार दिया गया है |
                                  अगर राज्यों में क्रमश: पार्टियों के बीच मुक़ाबला देखा जाए तो हर राज्य में दो पार्टियों के बीच ही मुक़ाबला है | राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में मुक़ाबला तो काँग्रेस और बीजेपी के बीच है | मिज़ोरम की बात की जाए तो वहाँ मुक़ाबला काँग्रेस और मिज़ो नेशनल फ्रंट के बीच है | दिल्ली में राजनीतिक समीकरण बुरी तरह से गड़बड़ा गए हैं | यहाँ मुक़ाबला दो पार्टियों के बीच नहीं बल्कि दो से अधिक पार्टियों के बीच    है | आप (आम आदमी पार्टी ), काँग्रेस और बीजेपी इस मुक़ाबले के प्रतियोगी
हैं | दिल्ली में अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी है कि कोई पार्टी बहुमत में आएगी भी या नहीं क्योंकि हर जनमत सर्वेक्षण कुछ अलग ही बयां करता  है | 

हालांकि चुनावों के पहले सर्वेक्षणों ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान के चुनावी परिणाम के बारे में भ्रामक तस्वीर प्रस्तुत नहीं की है | वहाँ सभी सर्वे एक ही बात को बता रहे हैं | लेकिन दिल्ली में हर सर्वे कुछ अलग बयां करता है | सर्वे की विश्वसनीयता को लेकर लोगों में संदेह पैदा हो रहे हैं |
                                      कोई दावा नहीं कर सकता कि हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण तरह विश्वसनीय होते हैं | हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि सर्वेक्षण के लिए सही साँचा ही तैयार नहीं हो पाता है | सर्वेक्षकों की विश्वसनीयता को लेकर सामान्य वोटर की दिलचस्पी दिखाई नहीं देती. और न उसे पेश करने वाले मीडिया हाउसों को उसे लेकर फ़िक्र दिखाई पड़ती है | मोटे तौर पर यह एक व्यावसायिक कर्म है जो चैनल या अख़बार को दर्शक और पाठक मुहैया कराता है | सर्वेक्षक अपनी अध्ययन पद्धति को ठीक से घोषित नहीं करते और किसी के पास समय नहीं होता कि उनकी टेब्युलेशन शीट्स को जाँचा-बाँचा जाए | सर्वेक्षण सिर्फ माहौल बनाने का काम करते नज़र आते हैं |  
                                     राजस्थान में विधानसभा चुनावों के लिए अभी तक जितने भी जनमत सर्वेक्षण सामने आए हैं उनमें बीजेपी को बढ़त लेते हुए बताया गया है  या वसुंधरा राजे की वापसी हो रही है | लेकिन पिछले एक दो  साल को देखा जाए तो वसुंधरा राजे की राह उतनी आसान नहीं लगती जितनी बताई जा रही है | पिछले एक दो साल में अशोक गहलोत ने कई लोकलुभावन योजनाएँ शुरू की हैं जो कि बीजेपी के सामने चुनौती पेश कर रही हैं | राजस्थान में एक तीसरी ताकत भी उभर रही है, वह ताकत है बीजेपी में रहे किरोरी लाल मीणा (वर्तमान में राष्ट्रीय जनता पार्टी में) और पी ए संगमा की पार्टी के गठबंधन की |

                                     राजस्थान चुनावों में बीजेपी ने भ्रष्टाचार, पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं को महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया है | अभी हाल फिलहाल में बलात्कार के मामले में बाबूलाल नागर की सीबीआई द्वारा गिरफ़्तारी से काँग्रेस सरकार मुश्किल में पड़ सकती है और बीजेपी इस मुद्दे को अच्छे से अपने फायदे के लिए भुनाएगा | अगर काँग्रेस सरकार की बात की जाए तो पिछले एक साल में गहलोत सरकार कई लोकलुभावन योजनाएँ लाई  है | इससे सरकार के पक्ष में एक माहौल बना है कि सरकार काम करना चाहती है | इन योजनाओं में जैसे मुफ़्त दवा और स्वास्थ्य संबंधी जांच योजना, पेंशन योजना, अन्न सुरक्षा योजना, पशुधन निशुल्क दवा योजना, मुख्यमंत्री आवास योजना, जीवन रक्षा कोष और लोक सेवा गारंटी प्रमुख हैं | काँग्रेस इन सभी योजनाओं को गेम चेंजर मान रही है | लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि ये सभी योजनाएँ चुनाव से एक साल पहले ही क्यों लायी गयी ?
                                       अगर 2008 के परिणाम की बात की जाए तो कुल 200 विधानसभा सीटों में काँग्रेस को 96, बीजेपी को 78, बसपा को 06, माकपा को 03, जदयु को 1, सपा को 1, निर्दलीय को 14, एलएसडब्लूपी को 1 सीट मिली थी | हो सकता है कि इस बार चुनाव में मोदी फ़ैक्टर काम कर जाए |  वसुंधरा राजे खुद कह रही हैं कि मुझे जिताओगे तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ होगा | लेकिन अभी से यह कहना मुश्किल है कि मोदी के कारण वोट ज्यादा आएंगे या बीजेपी इस बार चुनाव जीतेगी | ये तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा |

                 
                             अगर चुनावी गणित की बात की जाए तो पांचों राज्यों को मिलाकर कुल 73 लोकसभा सीटें हैं | मिज़ोरम में तो बीजेपी की सरकार बनाना नामुंकिन है | यदि काँग्रेस चुनाव हार जाती है तो इससे आने वाले चुनावों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा | यही बात बीजेपी पर भी लागू होती है | मिशन 2014 के लिए  केंद्र में सत्ता बनाने के लिए सेमीफ़ाइनल मैच में तो अच्छा प्रदर्शन करना ही होगा और अच्छे रनों (वोटों) से जीतना पड़ेगा |                                      
    

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