Sunday, August 17, 2014

Singham Returns Review


Singham Returns Review

जब मैं ये फिल्म देख रहा था तो बस उस समय यही लग रहा था कि यार, इन भ्रष्ट नेताओं, बाबाओं के साथ क्या ऐसा ही होना चाहिए ? जैसे ही फिल्म ख़त्म हुई, मैं भी फिल्म से बाहर आ गया क्योंकि अभी तक तो  फिल्म का एक हिसा बन चुका था । आप सभी ये बात तो मानते होंगे कि हमारे मन, मस्तिष्क, समाज पर बहुत प्रभाव डालती हैं ।
                                                                 बात करते हैं सिंघम रिटर्न्स  के रिव्यू की । फिल्म का समय , पात्र, मुद्दे , निर्देशक ने बखूबी बाज़ार की मांग के अनुसार उठाये हैं । मतलब यही कि जो इस समय बाज़ार में बहुत अच्छे से बिक सकता है उसे जैम कर बेचो तभी तो सिंघम रिटर्न्स  ने दो  दिन में ही लगभग 52 करोड़ रूपये कमा लिए हैं । भारतीय लोक पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र क्या है - हम भ्रष्टाचार, बेरोजगारी , मंहगाई ,  जैसे मुद्दों पर गंभीरता से सोचना चाहते हैं । हम युवा शक्ति को आगे लाना चाहते हैं । देश में भी इस समय यही मुद्दे बने हुए हैं ।
                                                                 बाबा और प्रकाश राव जैसे नेता समाज को बर्बाद कर रहे हैं । कुछ डायलॉग फिल्म के बहुत अच्छे हैं । हमारी अंधविश्वासी जनता ही ऐसे दो कौड़ी  के गुंडे को बाबा बनाती है और सोई हुई जनता ऐसे चोर को नेता ।
                                                                 एक और जबरदस्त दृश्य- मानते हैं इसने पैसा लिया, छाती ठोक के बोलती है पैसा लिया । अंदर डालेगा, डाल दे अंदर लेकिन कल अगर वापस मौका मिला न , तो मैं भी लेगी पैसा । क्योंकि हम लोगों को फर्क नहीं पड़ता है , 5 साल कौन सा सरकार चलेगा । अगले पांच दिनों तक हम लोगों को खाना पीना मिलेगा या नहीं मिलेगा, इससे हमको फर्क पड़ता है साहब, कल हम कैसे जियेगा, इस टेंशन में आज जीता है हम लोग । लेकिन डायलॉग के पहले बाजीराव अपने गुस्से को उतारने किस पर जाता है । गरीबों पर और उस गरीब का उत्तर ये है - ये डंडा , ये साला , खुद का कमजोरी छुपाने  के लिए मेरे बेटे पर ताकत दिखाता है - हाँ । तेरे को मालूम है न, प्रकाश राव ने पैसा दिया , तो जाके उसको मार न , उसको डंडा मार । है तेरे में हिम्मत ? ये मात्र एक डायलॉग नहीं है , ये हमारे समाज की सामंती व्यवस्था को दर्शा रहा है ।
                                                                 अगर फिल्म की पटकथा की बात करें तो पटकथा में कुछ नया नहीं है और तो और फिल्म में कई जगह बहुत अतिशयोक्ति है । फिल्मों में जबरदस्ती कई जगह एक्शन दृश्य भरे गए हैं । अगर एक्टिंग की बात करें तो बाबा की एक्टिंग फिल्म में कुछ अलग दिखाई देती है । अगर कैमरा वर्क , कैमरा ऐंगल इन सब के बारे  में बात करें तो इसके बारे में मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है इसलिए कोई कमेंट नहीं करूँगा ।

                                                                  और फिल्म के अंत में , दोनों अपराधियों को पुलिस वैन में अंदर ही छोड़कर उसे टैंकर से उड़वा देना । क्या वाकई में न्याय ऐसे ही होना चाहिए ? और अंत में  बाजीराव सिंघम  मीडिया पर्सन को बोलते हैं कि बाजीराव सिंघम के काम करने का यही तरीका है ।  क्या वाकई में यही तरीका है न्याय पाने का ?
                                                                   खैर आपका मन हो तो फिल्म देखने जाइये लेकिन फिल्म में एक फनी दृश्य है, वो ये है कि एक जगह दरवाजा बंद करके अपराधी अंदर घुस जाते हैं तो सिंघम की आवाज आती है - दया !! और आगे तो आप जानते ही हैं.………… !

                                                   

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