Friday, July 25, 2014

सी.पी. में बीती हुई एक रात !


सी.पी. में बीती हुई एक रात!

दिल्ली एक खुबसूरत जगह है। यहाँ हर किसी का घूमने का मन करता है। दिल्ली के बीचों-बीच स्थित एक जगह है, जिसे हम कनॉट प्लेस के नाम से जानते हैं। ये जगह वैसे तो बहुत खुबसूरत है, जहां बड़े-बड़े सिनेमाघर हैं, कई बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, पत्रकारों का जमावड़ा है, एक बड़ा बाज़ार है। जहां सुबह से लेकर शाम तक ये जगह चमकती रहती है, वहीं 10 बजते ही इस जगह का काला रूप सामने आने लग जाता है। पढ़कर आपको उत्सुकता हो रही होगी न कि आखिरकार ऐसी क्या बात है?  चलिये, ज्यादा सोचिए मत, हम आपको 10 बजे के बाद के कनॉट प्लेस की सैर करातें हैं। 

चलिये, शुरुआत करते हैं, पुरानी दिल्ली से। रात के तकरीबन 9:30 बज रहे थे,
जब मैं दिल्ली गेट के पास पहुंचा तो मेरे कदम एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को देखकर ठिठक गए। उसके गंदे कोट, बढ़ी हुई दाढ़ी, बढ़े हुए बालों और उसके अजीब अवस्था में पड़े रहने ने मुझे उससे बात बात करने के लिए मजबूर कर दिया। उसके कूड़े के ढेर, जो उसकी संपत्ति थी, से एक पन्नी निकालकर मैं बैठना चाहा लेकिन उसने अपनी संपत्ति का एक भी अंश देने से साफ-साफ इन्कार कर दिया और पन्नी अपनी तरफ खीच ली। मुझे मजबूरन वहीं बैठना पड़ा। मैंने उसके असहज चेहरे को सहज करने के लिए बातचीत शुरू करनी चाही।  इसके बाद मैंने उनका नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम बताया और मुझसे यहाँ बैठने का कारण पूछा , तो मैंने कहा कि आप यहाँ क्यों लेटे हैं, क्या आपका घर नहीं है? तो उसने कहा कि
“मैं पिछले 27 सालों से यहीं रहता हूं।”
“आप क्या काम करते हैं?”
“कूड़ा बीनता हूँ और पैसे कमाता हूं”
“कितने पैसे मिल जाते होंगे आपको?”
………………………………………………………………………….!
“पैसे कमाते हैं आप, तो यहाँ क्यों रहते हैं?”
आप हो कौन ? यहाँ क्यों आए हो और क्या जानना चाहते हो?”
“मैं बस आपसे बात करना चाहता हूँ और आपके बारे में जानना चाहता हूँ।”
“आप जो भी जानना चाहते हो, वो मैं तभी बताऊंगा, जब तुम अपने गुरु को यहाँ साथ लाओगे। बांकी मुझे सोना है। क्या टाइम हो रहा है?”
“10 बजने वाले हैं।”
“कनॉट प्लेस चले जाओ, मेरे जैसे वहाँ बहुत मिलेंगे।”

और फिर मैं वहाँ से चला आया और आगे की तरफ बढ़ा।

करीब 10:45 मिनट हुए हो रहे थे, जब मैं  दिल्ली की उस चमकदार जगह पर गया जिसे लोग सी.पी. कहते हैं। हालांकि मैं सी.पी. कई बार आया था, लेकिन यह पहला वाकया था, जब मैं रात के 10 बजे के बाद सी.पी. में घूम रहा था। अमूमन इस जगह पर बहुत चहल-पहल और शोर-शराबा रहता है, लेकिन इस समय यहाँ एक अजीब सी शांति चारों ओर व्याप्त थी। दुकानें बंद हो रही थी।  लोग अपने-अपने घर या तो जा चुके थे या फिर जाने वाले थे। कुछ एक गाड़ियों की रह-रह कर आवाजें आ रही थीं और जब मैं थोड़ा आगे बढ़ा, तो मैंने देखा कि एक व्यक्ति जिसकी उम्र करीब 35 साल रही होगी, वो कूड़ेदान में कुछ खोज रहा था। मैं उसके पास गया और उससे बात करनी चाही। उसने बड़ी तत्परता से मेरी तरफ देखा, मानों मैं उसकी कुछ मदद करने वाला हूं। उसके हाव-भाव से पता चल रहा था कि उसने किसी प्रकार का कोई नशा नहीं किया था।  

मैंने उससे पूछा कि क्या आप दिल्ली के रहने वाले हैं ? उसने बताया कि मेरे पिता जी के मरने के बाद मेरे चाचा ने सारी ज़मीन हथिया ली और मुझे घर से बेदखल कर दिया। किसी तरह मैं दिल्ली इस आस में पहुंचा कि कोई काम मिलेगा, कोई मदद मिलेगी, लेकिन उसकी खोज आज तक जारी है। तभी मेरे दिमाग में यह बात आई कि वो कूड़ेदान में अपनी ज़िंदगी को खोज रहा था। 
मैंने बस यूं ही उससे पूछा कि क्या आप नशा करते हैं ? तो उसने बताया कि स्मैक, सुलेशन, पेंट चरस, गांजा वगैरह मैं नहीं लेता क्योंकि इससे फेफड़ा जल जाता है। वैसे स्मैकिये रीगल के बगल रिबोली के आस-पास मिल जाएंगे। मैंने उससे और सवाल न करके रिबोली की तरफ बढ़ा।

वहाँ पहुँचने से पहले ही लगभग 7 साल के बच्चे को पीठ पर एक बड़ा सा बोरा लादे हुए देखा , जिसमें पता नहीं क्या भरा था ? मैंने उससे पूछा कि कि कहां जा रहे हो? उसने कहा कि “हनुमान मंदिर” जा रहा हूं। उसने मेरी तरफ उत्सुकता से देखा और पूछा “ माल है क्या ?” मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, हालांकि मैं इसी सवाल के जवाब के लिए घूम रहा था। 

मैं उसके सवाल का जवाब दिये बिना आगे बढ़ा ही था कि उसने मेरी शर्ट पकड़ ली और अपना दूसरा हाथ अपनी जेभ में डालकर 10-10 के दो नोट निकाल के मुझे देते हुए अजीब सी आवाज़ में कहने लगा कि भैया “माल दिलवा दो, नहीं तो मर जाऊंगा।” मैं उस सात साल के बच्चे को देखकर घबरा गया और हड़बड़ाहट में अपनी शर्ट छुड़ा कर हनुमान मंदिर की तरफ बढ़ा। 

उस लड़के ने मेरी शर्ट तो छोड़ दी लेकिन अजीब सी शक्ल बनाकर वहीं सड़क पर अपने बोरे को नीचे पटक कर बैठ गया। मैंने अपने कदम हनुमान मंदिर की तरफ बढ़ाए, लेकिन मन में एक अजीब सा भय आ गया था। अंतत: मैं हनुमान मंदिर पहुंचा। 

पहुँचते ही मेरा सामना जुआरियों से हुआ। जैसे ही मैंने जुआरियों को देखा, उनमें से एक जुआरी ने अपना ध्यान खेल से हटाकर अपनी त्योरीयां चढ़ाकर मेरी तरफ घूर कर देखा। मैंने बिना  कुछ प्रतिक्रिया दिये वहाँ से निकलना बेहतर समझा और आगे बढ़ गया। मैं कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि आगे मंदिर परिसर में एक महिला औंधे मुंह पड़ी हुई थी और बगल में उसका बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। उसकी चीख मंदिर परिसर में व्याप्त भयावह सन्नाटे को चीर कर कई बड़े सवाल खड़े कर रही थी। 

आगे बढ़ने पर बाबाओं का झुंड दिखाई दिया जो कि पूर्णता नशे में धुत्त थे और बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे। आगे बढ़ते ही जिसकी उम्र 27 साल रही होगी, वो मेरे साथ-साथ चलने लगा। जैसे-जैसे उसके कदम मेरे साथ होने लगे, अजीब सी घबराहट हमारे आगे बढ़ने के साथ बढ़ती जा रही थी। अचानक मेरे मन में ख्याल आया कि मैं रुक जाता हूँ, शायद वह व्यक्ति आगे जाना चाहता हो लेकिन जैसे ही मैं रुका, वो भी रुक गया। मेरी धड़कनें बहुत तेज चलने लगीं थी और मैं सड़क तक आ पहुँचा था। 

मैं आगे बढ़ा और पास में खड़ी कैब के पास यह सोचकर पहुंचा कि इसके अंदर कोई होगा, तो उसके डर से यह व्यक्ति मेरा पीछा छोड़ दे लेकिन यह क्या, इसने कैब का दरवाजा खोला। यह देखकर मेरा शरीर कुछ देर के लिए थम गया। उस व्यक्ति ने अंदर हाथ डाला और कुछ पैकेट निकाले और  बोला कि "माल एकदम असली है।" चैक कर लो। मैंने नहीं  कहते हुए अपने कदम तेजी से आगे बढ़ाये और वो व्यक्ति काफी देर तक कहता रहा कि माल असली है, एक दम प्योर है, ले लो लेकिन मैंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा, मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

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