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Friday, September 05, 2014

भारत- आस्ट्रेलिया संबंध: नए ऊचाइयों की ओर

 PM NARENDRA MODI WITH AUSTRALIAN P.M. TONNY ABBOTT
भारत- आस्ट्रेलिया संबंध: नए ऊचाइयों की ओर
भारत और आस्ट्रेलिया के बीच एक समझौते “असैन्य परमाणु समझौता (civil nuclear deal)” पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत भारत अब आस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीद सकेगा | भारत ऐसा पहला देश होगा, जो कि परमाणु अप्रसार संधि( nuclear non proliferation treaty) पर हस्ताक्षर किए बिना आस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीद सकेगा | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया है | दोनों देशों के बीच चार समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं |
1.   नाभिकीय ऊर्जा का शांतिपूर्ण कार्यों में प्रयोग करने के लिए सहयोग
2.   खेल के क्षेत्र में सहयोग
3.   जल संसाधन प्रबंधन(water resource management) के क्षेत्र में सहयोग
4.   तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग


                                            नरेंद्र मोदी ने आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबाट का स्वागत करते हुए कहा कि हमारे लिए आस्ट्रेलिया एक बेहतर रणनीतिक साझेदार है और हम आस्ट्रेलिया के साथ सम्बन्धों को और अच्छा करना चाहते हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलंबो प्लान की घोषणा की, जिसके तहत दोनों देशों की युवा शक्ति शिक्षा के क्षेत्र में और प्रगति कर सकेगी | इससे पहले  टोनी एबाट ने मुंबई में कहा था कि “ हम चाहते हैं कि हमारे यहाँ के छात्र भी ज्यादा से ज्यादा इस महान देश में आए और यहाँ ज्ञान प्राप्त करें |
                                              इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आस्ट्रेलिया के सम्बन्धों में सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद, साइबर आतंक(cyber threat) जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर ज़ोर दिया | नरेंद्र मोदी ने ये भी ऐलान किया कि वे जी-20 सम्मेलन के बाद नवंबर में आस्ट्रेलिया के दौरे पर जाएंगे | 28 वर्ष बाद यह पहली बार होगा जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री आस्ट्रेलिया दौरे पर जाएगा | समय और समय की जरूरत के हिसाब से आस्ट्रेलिया और भारत एक दूसरे के साथ अपने सम्बन्धों को अच्छा करने पर ज्यादा ज़ोर दे रहे हैं |
                                             आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी ऐबाट ने कहा कि “हमने असैन्य परमाणु समझौता (civil nuclear deal) पर हस्ताक्षर किए हैं क्योंकि आस्ट्रेलिया का भारत में विश्वास है कि वह इसका सही क्षेत्र में सही तरीके से उपयोग करेगा जैसा कि उसने अभी तक प्रत्येक क्षेत्र में किया है | हम भारत को यूरेनियम देकर बहुत खुश हैं |”
                                              ऐसा नहीं है कि ये समझौता मोदी सरकार के कारण ही हुआ है | 2012 से ही लगातार दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर वार्ताएं चल रही थी और अंतत: ये संभव हो गया |  असैन्य परमाणु समझौता (civil nuclear deal) पर काँग्रेस नेता शकील अहमद का कहना है कि जो समझौता आज हुआ है , वह तो मनमोहन सरकार के समय ही संभव हो गया था |
                                             आस्ट्रेलिया असैन्य परमाणु उपयोग के लिए भारत को यूरेनियम देने को तैयार हो गया | यानि कि अब भारत आस्ट्रेलिया से आयातित यूरेनियम का उपयोग बिजली, नाभिकीय रियेक्टर जैसे क्षेत्रों में हो सकेगा | आस्ट्रेलिया और भारत के बीच हुए करार से एशिया महाद्वीप में शक्ति संतुलन पर काफी प्रभाव पड़ेगा | नरेंद्र मोदी अभी कुछ ही दिन पहले जापान यात्रा पर गए थे , लेकिन वहाँ नाभिकीय समझौता नहीं हो पाया था |
                                             यदि पूरे विश्व में यूरेनियम की बात करें, तो पूरे विश्व का 40% यूरेनियम आस्ट्रेलिया के पास है | आस्ट्रेलिया, जिस देश में अभी तक कोई न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं है, वह दुनिया में आयात करने वाला सबसे बड़ा देश है | सरकारी सूत्रों के अनुसार, वित्त-वर्ष 2011/12 में आस्ट्रेलिया ने 7529 टन यूरेनियम का खनन किया था , जिसकी कीमत 782 मिलियन आस्ट्रेलियन डॉलर (A$782) के बराबर है |
                                               बात करते हैं असैन्य परमाणु संधि (Civil Nuclear Deal) से होने वाले फायदे की | भारत जैसे देश के लिए असैन्य परमाणु संधि होना देश के विकास के लिए बहुत आवश्यक है | आस्ट्रेलिया ने पहले भारत को यूरेनियम देने से मना कर दिया था | उसके पीछे आस्ट्रेलिया का तर्क था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non Proliferation Treaty) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं | आस्ट्रेलिया ने उस समय ये भी सवाल उठाया था कि नाभिकीय सुरक्षा के लिए सुरक्षा मानक उचित हैं या नहीं | भारत ने NPT पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है क्योंकि इसमें बहुत अधिक खामियाँ हैं | यदि भारत इसमें हस्ताक्षर कर देता है, तो उसके परमाणु संसाधन बहुत सीमित हो जाएंगे | यह संधि भेदभाव पूर्ण है |  
 NPT & NON NPT MEMBERS

                                           परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non Proliferation Treaty)  है क्या ? जब तक इसको समझ नहीं लेते हैं तब तक असैन्य परमाणु संधि (Civil Nuclear Deal) न होने के कारण समझ नहीं आएंगे |  परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non Proliferation Treaty) परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण ढंग से प्रयोग को बढ़ावा देने और परमाणु हथियारों का विस्तार रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का एक नतीजा है | इसे 1970 में बनाया गया था, जिसका उद्देश्य था कि परमाणु हथियारों को पाँच देशों (अमेरिका, सोवियत संघ{आज का रूस}, चीन, ब्रिटेन, फ़्रांस) देशों तक सीमित रखना, जिनके पास परमाणु हथियार थे और जो ये स्वीकार करते थे | चीन और फ़्रांस ने इस संधि पर शुरू में हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, पर 1992 में इस संधि पर चीन और फ़्रांस ने हस्ताक्षर कर दिये | इस संधि पर 187 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं , हालांकि भारत, पाकिस्तान,उत्तर कोरिया और इसराइल ने अभी तक इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं | इस संधि की कई शर्ते हैं , जैसे कि यह गैर परमाणु देशों को न तो हथियार देंगे और न ही इन्हें हासिल करने में उनकी मदद करेंगे | हालांकि, उन्हें इस बात की इजाजत होगी कि वे परमाणु ऊर्जा शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए विकसित कर सकते हैं लेकिन वह भी वियना स्थित अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों की देखरेख में होगा


                                               भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निकाय लिमिटेड (Nuclear Power Corporation of India Limited) के अनुसार, भारत 20 छोटे , 4780 मेगा वाट क्षमता वाले नाभिकीय रियेक्टर  संचालित कर रहा है, जो कि कुल ऊर्जा खपत का 2-3.5% है | सरकार को आशा है कि 2032 तक नाभिकीय ऊर्जा क्षमता 63,000 मेगा वाट तक बढ़ जाए, जिसमें लागत लगभग 85 डॉलर बिलियन होगी | भारत में बिजली की आपूर्ति न हो पाने के कारण विकास कई स्थानों में अवरुद्ध हो गया है | भारत में 20 रियेक्टर में 10 अभी भी अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA)  की निगरानी में हैं | इन रियेक्टर के अधिकतर यूरेनियम रूस और कजाकिस्तान से आता है | देश में इस समय बिजली के लिए परंपरागत स्रोत लगातार कम होते जा रहे हैं | कोयला जैसे परंपरागत स्रोतों पर निर्भर रहकर देश की बिजली जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता | हमारे देश में जल संसाधनों से भी उतनी बिजली नहीं मिल पा रही है | यदि जल संसाधनों की ओर ज्यादा बढ़ते हैं , तो उसमें पर्यावरणीय नुकसान बहुत अधिक है | भारत में बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए नाभिकीय ऊर्जा का योगदान 2-3.5% है, जबकि फ़्रांस में यही 73% है और दक्षिण कोरिया में 28% है |
                                                  अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट की संख्या बढ़ेगी तो उससे कंपनियों के बीच प्रतियोगिता बढ़ेगी |  प्रतियोगिता बढ़ेगी तो न्यूक्लियर ऊर्जा सस्ती भी होगी | लेकिन प्रारम्भिक अवस्था में न्यूक्लियर पावर महंगी होगी और न्यूक्लियर रियेक्टर के रख-रखाव में खर्चा बहुत अधिक आता है | लेकिन अगर संपोषणीय विकास(Sustainable Development) की बात करें तो उस मामले में यह ऊर्जा सबसे सस्ती बैठती है | इस समय भारत में फ़्रांस, रूस, अमेरिका और कई देशों की नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाली कंपनियाँ भारत आने को इच्छुक हैं | ऐसे में जब आपूर्तिकर्ता(Supplier) बहुत ज्यादा होंगे, तो ऊर्जा की कीमत उतनी ही गिरेगी, हालांकि ये सब होने में बहुत वक़्त लगेगा | ऐसे में टोनी ऐबाट की घोषणा भारत के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण मायने रखती है |
                                                यदि भारत और आस्ट्रेलिया के बीच होने वाले व्यापार के विकास की बात करें, तो पिछले कुछ वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोत्तरी हुई है | एक दशक पहले भारत, आस्ट्रेलिया को निर्यात के आकड़ों के मामले में शीर्ष दस में नहीं था, लेकिन आज हम आस्ट्रेलिया के पांचवे बड़े निर्यातक देश हैं | व्यापारिक असंतुलन लगातार सुधार रहा है | भारत की कई कंपनियों जैसे टाटा कंसलटेंसी, इंफोसेसिस, महिंद्रा एयरोस्पेस आदि कंपनियों ने आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में बहुत मात्रा में निवेश कर रखा है | आकड़ों की बात करें, तो  यह इस समय तक लगभग 11 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है | भारत और आस्ट्रेलिया के व्यापार 2003 में 5.1 बिलियन आस्ट्रेलियन डॉलर से बढ़कर 2013 में 15.2 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है | असैन्य परमाणु संधि हो जाने से भारत और आस्ट्रेलिया के बीच व्यापार और अधिक बढ़ेगा लेकिन इसमें आस्ट्रेलिया को लाभ होने की ज्यादा उम्मीदें हैं |
                                              मेलबर्न विश्वविद्यालय के आस्ट्रेलिया-इंडिया संस्थान के अनुसार, आस्ट्रेलिया भारत के व्यापारिक साझेदारी के पसंदीदा देशों में अमेरिका, जापान और सिंगापुर के बाद चौथे स्थान पर है |
                                                मोदी की पॉलिसी रडार में व्यावसायिक शिक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है | भारत में पिछली सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के लिए कई प्रयास किए थे, लेकिन वे असफल हो गए थे | आस्ट्रेलियन विश्वविद्यालय भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बाजार देखते हैं |
                                                 भारत और आस्ट्रेलिया के हिन्द-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र(Indo-Pacific Region) पर साझा हित हैं | हिन्द-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र(Indo-Pacific Region) में चीन के बढ़ते दबदबे से कई देश चिंतित हैं | इसका संकेत हमें मोदी की जापन यात्रा में भी मिल जाता है, जिसमें मोदी ने अप्रत्यक्ष तौर पर चीन का नाम लिए बिना ये कहा था कि “कुछ देश अभी भी 18वीं सदी की विस्तारवाद की नीति में विश्वास रखते हैं , लेकिन मेरा विश्वास विकासवाद की नीति में है | ऐसे में अमेरिका भी चीन से प्रतिद्वंदी के तौर पर एशिया महाद्वीप में भारत को खड़ा करना चाहता है, जिसके कारण 2008 में अमेरिका 2008 में अमेरिका भारत को शांतिपूर्ण कार्यों में परमाणु सहयोग देने में सहमत हो गया था |
                                                  अमिताभ मातो( डायरेक्टर, इंडिया-आस्ट्रेलिया संस्थान, प्रोफेसर{मेलबर्न विश्वविद्यालय और जे.एन.यू.}) का अपने लेख “The New Promise of India-Australia Relations” में कहना है कि पूर्व में भारत,जापान और अमेरिका के साथ आस्ट्रेलिया के सैन्य रिश्ते स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देते थे, लेकिन अपने हितों को देखते हुए, विश्व अर्थव्यवस्था में शक्ति के केंद्र को बदलने के कारण अब इन्हीं देशों को एक साथ आगे आना पड़ रहा है |
                                                    लेकिन इसको पूरा होने में वक़्त कितना लगेगा;  क्या भारत, आस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान के हितों में टकराव नहीं होगा ? इस बात की कोई गारंटी नहीं है | यदि नाभिकीय सयन्त्र से ऊर्जा की बात करें , तो भारत में इसको लेकर संशय व्याप्त है | इसकी सुरक्षा को लेकर लोगों में डर व्याप्त है |  ऐसे में आस्ट्रेलिया असैन्य परमाणु उपयोग के लिए भारत को यूरेनियम देने को तैयार हो गया है | अब आगे भारत को देखना है कि वो इन सभी संशय को दूर करने के लिए किस तरीके की रणनीति अपनाता है |


 साभार:
http://www.aljazeera.com/indepth/opinion/2014/09/new-promise-india-australia-rela-20149314139549494.html 
http://theconversation.com/abbotts-visit-to-take-australia-india-relations-beyond-cricket-31056,
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Australia-to-sign-civil-nuclear-deal-to-sell-uranium-to-India/articleshow/41614731.cms
PTI Input, BBC, MEA, International Relations- Dr. Tapan Biswal


                                                
                                      

Saturday, August 30, 2014

जन-धन योजना : कुछ अनसुलझे प्रश्न



जन-धन योजना : कुछ अनसुलझे प्रश्न


आम आदमी तक बैंक की सुविधाओं को पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ड्रीम योजना “जन-धन योजना” को लोगों ने हाथों-हाथ लिया और पहले ही दिन बैंकों में 1.5 करोड़ खाते खोलकर एक नया रिकॉर्ड कायम कर लिया | इस योजना के तहत, बैंक  26 जनवरी, 2015 तक लगभग 7.5 करोड़ परिवारों तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचायेंगे |
                                                   इस योजना के तहत खातेदार को एक डेबिट कार्ड, खाते में जमा रकम से 5,000 रुपए ज्यादा निकालने की सुविधा, 30,000 रुपए का जीवन बीमा कवर और दुर्घटना की स्थिति के लिए 1,00,000 रुपए की बीमा सुरक्षा दी जाएगी | इस योजना के तहत खाताधारकों को शुरुआत में 2,000 रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा यानि कि खाते में जमा रकम से 2000 रुपए, जिसे बाद में बढ़ाकर 5,000 रुपए कर दिया जाएगा |
                                                   इस योजना में आपको कई सुविधाएं मिलेगी | अगर आप बाहर से हैं और आपका खाता अभी तक नहीं खुला है, तो अब इस योजना के तहत आपका खाता खुल जाएगा | पहले बैंक में खाता खुलवाने के लिए मिनिमम बैलेन्स, गारंटर, कई सारे दस्तावेज़ की जरूरत होती थी , लेकिन इस योजना के तहत अब आपको दस्तावेजों में आधार कार्ड या कोई सरकारी दस्तावेज़, जिससे आपकी पहचान जाहिर होती हो, इससे खाता खुल जाएगा | अब आपको न ही कोई गारंटर की जरूरत होगी और न ही खाते में कोई मिनिमम बैलेन्स का झंझट होगा |
                                                  बैंकों का राष्ट्रीयकरण 1969 में किया गया था और इसका लक्ष्य था कि बैंकों की पहुँच भारत के दूर-दराज इलाकों और गरीबों तक हो | बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाएँ दूर-दराज इलाकों में खोली गईं लेकिन देश में अभी भी  40 फीसद लोग भारतीय अर्थव्यवस्था में भेदभाव के शिकार हैं | बैंक से जुड़ना, भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान देना होता है |
                                                   अगर बैंक सुविधाओं की भारत में बात की जाए, तो बैंकिंग सेवाओं के मामले में हम चीन और ब्राज़ील से काफी पीछे हैं | वर्ष  2011 में वित्तीय सेवाओं से जुड़े एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ कि भारत में 1 लाख लोगों पर औसतन 10.6 शाखाएँ और 9.9 एटीएम मशीने हैं | इसकी तुलना में चीन में 1 लाख लोगों पर औसतन 23.8 शाखाएँ और 49.6 एटीएम और ब्राज़ील में यही आंकड़ा 46.2 शाखा और 119.6 एटीएम तक पहुँच जाता है |(संदर्भ- बिज़नस स्टैंडर्ड ) भारत में शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं सुलभ हैं लेकिन जैसे ही आप ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की तरफ बढ़ते हैं, बैंकिंग सुविधाएं बहुत कम होती चली जाती हैं |
                                                  गांवों, कस्बों में संपर्क की बहुत बड़ी दिक्कत है | लोग खाते तो खुलवा लेते हैं, लेकिन खाता खुलवाना ही बैंक सेवाओं से जुड़ना नहीं है | अगर मैं अपने यहाँ कालपी की बात करूँ तो कालपी के 15 किलोमीटर के दायरे में कई गाँव हैं, लेकिन अभी तक कालपी में सिर्फ 5 बैंक हैं | गाँव के लोग कालपी में आकार अपना खाता खुलवाते हैं |
                                                   जन-धन योजना के नीति- निर्माण के कई पहलू अनसुलझे हुए हैं, जो कि अभी तक स्पष्ट नहीं हैं | ये समस्यायेँ अभी भी बनी हुई हैं और यही सबसे बड़ी चुनौती भी हैं | सबसे बड़ी समस्या बैंकों की पहुँच है | साल 2006 में जब रिजर्व बैंक ने दूर-दराज इलाकों में बैंकिंग सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने  के लिए बैंकों को बिजनेस कारोस्पोंडेट रखने की अनुमति दी थी | उस समय यह एक बड़ा कदम था | इस योजना के बारे में आम राय थी कि इससे लोगों में बैंकिंग सेवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सकेगी और खाताधारकों को खाता इस्तेमाल करने के प्रति भी सक्रिय बनाया जा सकेगा | लेकिन हाल में आरबीआई कालेज आफ एग्रीकल्चरल बैंकिंग (सीजीएपी) के एक सर्वे में जो तथ्य सामने आए, उसने उपरोक्त कोशिशों की नाकामी की तस्वीर सामने रखी है। 2013 में सितम्बर और नवम्बर महीने की अवधि में देश के पंद्रह बड़े राज्यों में 2,358 एजेंटों से संपर्क करने पर यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि इनमें से सिर्फ 53 फीसदी से ही किसी तरह संपर्क साधा जा सकता है। बाकी 47 फीसदी एजेंटों तक पहुंचा भी नहीं जा सकता। जिन 53 फीसदी तक पहुंच संभव है, उनमें से भी 16 फीसदी ने एक भी बार किसी तरह का लेन-देन नहीं किया। रिजर्व बैंक और सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2013 तक देश भर में उसके पास 2.2 लाख बैंकिंग एजेंट हैं।  बैंक कररेस्पोंडेंट रखने का मुख्य उद्द्येश्य दूर-दराज के लोगों में बैंकिंग सेवाओं के प्रति लोगों को जागरूक करना था लेकिन बैंकिंग एजेंटों की सक्रियता के मामले में भारत का रिकार्ड कई अफ्रीकी देशों से भी खराब है। भारत में एक बैंकिंग एजेंट प्रति दिन औसतन नौ लेन-देन करता है, तो केन्या में यह आंकड़ा 62 और तंजानिया और युगांडा में क्रमशः 35 और 34 है। 
                                              दूसरी सबसे बड़ी चुनौती खाता को सक्रिय बनाए रखना है मतलब ये कि खाता में लेन-देन लगातार होता रहे | नरेंद्र मोदी की इस मामले में नीति की बात करें, तो वे टार्गेट अप्रोच (आधारित सोच) को बढ़ावा दे रहे हैं | नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 26 जनवरी, 2015 तक लगभग 7.5 करोड़ परिवारों तक बैंकिंग सुविधाओं को पहुंचाना है | प्रधानमंत्री का इस बात पर इतना ज़ोर क्यों है कि गांवों में ऋण प्रदान करने, पैसा जमा करने की एक समानान्तर प्रक्रिया चल रही है | लोग साहूकार, बनिया से कर्ज लेते हैं | अगर यही कर्ज लोग बैंक से लेना शुरू कर दें, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा | ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित होगी | गांवों का पैसा जो अभी तक साहूकारों और बनिया के पास था , वो लिक्विड फॉर्म में बैंकों में जाएगा | इस प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए बिजनेस कारोस्पोंडेट (बैंकिंग एजेंट) की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है |
                                                   रिजर्व बैंक और बैंकों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा कि खाते खुलवाने के साथ-साथ उनकी प्राथमिकता खातों में लेन-देन जारी करवाना हो | सरकार ने कहा है कि इस योजना के तहत खातेदार को एक डेबिट कार्ड, खाते में जमा रकम से 5,000 रुपए ज्यादा निकालने की सुविधा, 30,000 रुपए का जीवन बीमा कवर और दुर्घटना की स्थिति के लिए 1,00,000 रुपए की बीमा सुरक्षा दी जाएगी, लेकिन इसके लिए सरकार का बजट क्या होगा, नीतियाँ क्या होंगी? इस बारे में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है | ये सारा पैसा सरकार बैंकों को देगी | सरकार की ये मंशा है कि  सरकारी योजनाओं का धन ज्यादा से ज्यादा लोगों में सीधे उनके खातों तक पहुंचे | लेकिन सवाल यह है कि अति पिछड़े वर्ग तक, अति पिछड़ी जगहों पर बैंकिंग सुविधाएं कैसे पहुंचेगी? क्या ये वर्ग भी इन सुविधाओं का लाभ उठा पाएगा ?
                                                     नीतियाँ किस तरह से लागू की जाएंगी, उनका क्रियान्वयन किस तरह से होगा, ये तो योजना के सही तरह से लागू होने के बाद ही पता चलेगा | क्या बैंकिंग कारोस्पोंडेट की स्थिति पहले जैसी ही रहेगी या फिर इसमें कोई परिवर्तन आएगा | आशा है कि बैंकिंग सेवाएँ जल्द ही क्लास से बढ़कर मास तक पहुंचेगी | 40% आबादी को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ना वाकई में बहुत जरूरी है क्योंकि ये आबादी अभी तक वित्तीय छुआ-छूत का शिकार है | सरकार को, बैंकों को लोगों को बैंकिंग सेवाओं के बारे में जागरूक करना होगा | ऐसा होने में काफी वक़्त लगेगा और इस समय सरकार और बैंकों की प्राथमिकता सिर्फ खाता खुलवाना न हो | बैंकों की पहुँच लोगों तक हो न कि लोगों की पहुँच बैंकों तक हो | बैंक घर-घर लोगों तक पहुंचे, माइक्रो बैंक व्यवस्था के माध्यम से गांवों, कस्बों में लोग बैंकिंग सेवाओं से जुड़े |  
  
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साभार- बिज़नस स्टैंडर्ड, नया इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस                                    


                                                                                          

Sunday, July 20, 2014

तमस उपन्यास -


                                                                            तमस उपन्यास

तमस उपन्यास भीष्म साहनी द्वारा लिखित भारतीय इतिहास के एक दुखद अध्याय को व्यक्त करता है । तमस की पृष्ठभूमि देश के विभाजन की घटनाएँ हैं । वो वक़्त हमारे देश का बहुत दुखद अध्याय है । जब लाखों बेगुना लोग अलग- अलग धर्मों को मानने वाले या तो मारे गए या बेघर हुए । औरतों ने अपनी आत्मरक्षा के लिए कुएं में कूदकर जाने दीं, लाशें फूल-फूल कर ऊपर आने लगीं। कई पेट से औरतों के पति मर गए, कई माओं के बच्चे मर गए । कई बूढ़े बेसहारा हो गए । हिन्दुओं, मुसलमानों, सिक्खों के बीच नफ़रत, शक, द्वेष फैलाकर राजनीतिक दलों ने अपना राजनीतिक मतलब निकालने की कोशिश की गयी । वो जमाना था जब समझ- बूझ के लोग बड़ी ही नासमझी की बात करने लगे थे और कई आम जन इंसानियत की मिशाल पेश कर रहे थे । ये वक़्त था जब देश में देशभक्ति भावना की लहर दौड़ रही थी और दूसरी तरफ देश में बुरी तरह से सांप्रदयिकता का ज़हर घोला जा रहा था । और उस समय कितना खून - खराबा हुआ जिसकी भरपाई असंभव है । उसके नतीजे के फल स्वरुप लोगों में एक दुसरे के प्रति दुर्भावना पैदा हुई,जिसके नतीजे हमें आज तक दिखाई दे रहे हैं । 

तो कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा होगा कि मैं इस समय ये सब बातें क्यों कर रहा हूँ, मैं गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहा हूँ? मेरा मन ये भी नहीं कि मैं लोगों की यादें जिंदा करूँ या फिर उन्हें वापस उस डर के सायें में ले चलूँ जहाँ लोग जाना नहीं चाहते । 


आज इस त्रासदी को बीते हुए 67 वर्ष बीत चुकें हैं लेकिन हमारे समाज में साम्प्रदायिक तत्त्व अभी तक ख़त्म नहीं हो पायें हैं । उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,असम में अभी हाल-फ़िलहाल में ऐसी घटनाएँ घटित हुई हैं जिन पर कार्यवाही को भी सियासी रंग चढ़ा दिया है । इन साम्प्रदायिक तत्वों से पीड़ित लोग आज भी न्याय के इन्तजार में हैं । जातीय और धार्मिक दुर्भावना फ़ैलाने वाले लोग आज भी अपनी आवाज उठा रहे हैं । 




तमस उपन्यास में साम्प्रदयिक तत्वों के मंसूबे को बहुत ही बारीकी से बताया गया है । इस उपन्यास के कई वाक्य सीधे दिल को छूते हैं और आपसे कई सवाल करते हैं । एक दृश्य में -
"नाम ?'
"हरनाम सिंह"
"वल्दियत?”
"सरदार गुरदयाल सिंह"
"मौज़ा"
"ढोक इलाहीबख्श"
"तहसील"
"नूरपुर"
"कितने घर हिन्दुओं, सिक्खों के थे?"
"केवल एक घर , मेरा घर जी ।"
बाबू ने सिर उठाया । बड़ी उम्र का एक सरदार सवालों के जवाब दिए जा रहा था। 
"तुम बचकर कैसे आ गए?"

एक और मार्मिक दृश्य-


जसबीर कौर कुँए में कूदी। उसके कूदते ही न जाने कितनी ही स्त्रियाँ कुँए की जगत पर चढ़ गयीं । देवसिंह की घरवाली अपने दूध पीते हुए बच्चे को छाती से लगाकर कूद गयी । प्रेमसिंह की पत्नी तो कूद गयी ,पर उसका बच्चा पीछे ही खड़ा रह गया। उसे ज्ञान सिंह की पत्नी ने माँ के पास धकेलकर पहुंचा दिया। देखते ही देखते गाँव की कई औरतें कुँए में कूद गयीं।

The hasty reformer who does not remember the past will find himself condemned to repeat it. 
- Sir John Buchan