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Friday, October 25, 2013

फिल्म समीक्षा : खामोश पानी




फिल्म समीक्षा : खामोश पानी 

बैनर : श्रीनगर फिल्म्स 
निर्माता : साभिया सुमर 
निर्देशन : साभिया सुमर 
कहानी लेखक : परोमिता वोहरा 
संगीत : मदन गोपाल सिंह, अरशद महमूद और अर्जुन सेन  
कलाकार : किरण खेर, शिल्पा शुक्ला, आमिर मलिक
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए 105 मिनट 
रेटिंग 4.5/5
आज Cine मंच द्वारा खामोश पानी को दिखाया गया | ऐसी फिल्मों को देखकर मन में यही सवाल उठता है कि ऐसी फिल्में एक बड़े समूह तक क्यों नहीं पहुँच पाती ??? एक बात तो पूर्णतया सत्य है कि फिल्में हमारी विचारधारा और मानसिकता पर किसी और अन्य माध्यम से ज्यादा अच्छे तरीके से प्रहार करती हैं | इसीलिए शायद अभी सेंसरशिप भारत सरकार द्वारा गठित सेंसरशिप बोर्ड द्वारा सिर्फ इसी कारण से फिल्मों पर की जा रही है | अगर फिल्म की  बात की जाए तो यह फिल्म मुख्यता धर्म, धर्म के नियम, कायदे और कानून किसने बनाए हैं, इस बात पर सोचने को मजबूर करता है | और किस तरह धर्म के नाम पर निर्दोष नवयुवकों को सही रास्ते से गलत रास्ते पर धकेल दिया जाता  
 है | दुनिया को एक अलग नज़रिये से देखने की जरूरत है | अभी तक हमने दुनिया को सिर्फ एक नज़रिये से देखा है और वह नज़रिया है पित्रसत्तात्मक तरीका | किस तरह धर्म के नाम पर और उस धर्म की इज्जत के नाम पर हमेशा स्त्रियों को बलिदान देना पड़ता है | इस फिल्म में भी इस बात को बखूबी दिखाया गया है |
                                                                                                      अगर बात करें फिल्म के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की, तो सभी ने दमदार और एक प्रभाव छोड़ देने वाला अभिनय किया है | सलीम, आएशा का लड़का जो कि शुरूआत में बहुत सामन्य तरीके से ज़िंदगी व्यतीत कर रहा होता है | वह अपनी माँ, अपनी मित्र सबसे अच्छे तरीके से व्यवहार कर रहा होता है | अचानक उसके गाँव में दो कट्टरपंथी विचारधारा वाले दो व्यक्ति आते हैं | और वे गाँव में सभी भोले भले लोगों का brain wash करना शुरू कर देते हैं | जिन लोगों की अभी नौकरी नहीं लगी है, जिन्हें धर्म के बारे में कुछ पता नहीं है, उन लोगों को बंदूक धमा दी जाती है | क्यों??? अमीन साहब जो कि पोस्टमैन होते हैं वे भी अपनी पत्नी को साफ-साफ मना कर देते हैं कि आएशा को उनकी बेटी की शादी मैन आने की जरूरत नहीं है | जबकि उसकी पत्नी आएशा को अपनी बहन समान मानती है | लेकिन समाज के बनाए गए नियम,कायदे-कानून के आगें वे भी वेवश नज़र आतें हैं | कहानी आगें बढ़ती है और सिक्ख समुदाय पाकिस्तान ननसाहेब के दर्शन के लिए आतें हैं और वहाँ उनका विरोध वही कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोग विरोध कर रहे होते हैं वो भी तलवार लाठी लेकर | यहाँ एक सवाल उठता है कि प्रशासन इस समय कहाँ रहता है ? अभी हाल-फिलहाल में मुज्जफरनगर घटना में भी यही हुआ था | लोगों को धर्म के आधार पर बाँट कर दंगे करवाए गए थे | राजनीति में धर्म के नाम पर लड़ाया जाता है |
                                                                                              अंत में बस एक ही बात कहना चाहूँगा कि इस तरह की फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए |  सभी लोग इसके लिए काम करें |

Sunday, September 29, 2013

फिल्म समीक्षा: The War U Don’t See


निर्माता : एलन लोरी, जॉन पिल्गर, क्रिस्टोफर हर्ड
निर्देशन : एलन लोरी, जॉन पिल्गर
कहानी लेखन : जॉन पिल्गर
संगीत : सचा पुट्टनम
कलाकार : जॉन पिल्गर, रागेह ओमार, डैन रेदर, मार्क कार्टिस,                          कार्नेरॉसजूलियन अंसाजे, सिनथिया मैककिनी
समयावधि : 97 मिनट
रेटिंग :     5/5
                                           जॉन पिल्गर ने अपनी फिल्म द वार यू डांट सी में पत्रकारिता के बीच संघर्षों को दिखाया है | उन्होने यह भी परीक्षण किया है कि किस तरह सरकार अपने फायदे के लिए मानवीयता को भूलकर युद्ध कराने में जुट जाती है |
                                           उन्होने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि इराक और अफ़गानिस्तान जैसे खूंखार तथा भयावह युद्ध में मीडिया की क्या भूमिका होनी चाहिए और युद्ध के अपराध को कैसे तर्कसंगत तथा न्यायोचित तरीके से रिपोर्ट किया जाए | जिनका यह पेशा है उनका काम यह है किसी शक्ति के दवाब में न आ कर सच्चाई को जनता तक पहुंचाना चाहिए | इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह सरकार प्रैस की स्वतन्त्रता का गला घोंट कर अपने काले कारनामों को सही ठहराने के लिए मीडिया का गलत उपयोग करती है |
                                        रणनीतिक साझा के तहत किए गए राजनीतिक युद्ध में मानवता की परवाह किए बिना कई बच्चे मारे जाते हैं, कई औरतें विधवा हो जाती हैं, कई लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है, कई माताओं को अपने बच्चों से जुदा होना पड़ता है |
                                        युद्ध की स्वतंत्र हो कर करनी चाहिए | उन्होने कई लोगों जैसे स्टुअर्ट ऐवेन, मेल्विल गुडमैन, ब्रायन व्हाइटमैन, मार्क करटिड, गाय स्मालमैन आदि का साक्षात्कार किया | कई लोगों ने इस बात को स्वीकारा है कि इराक युद्ध के समय गलत तरीके से रिपोर्टिंग हुई थी |
                                      अंत में बस यही कहना चाहूँगा कि यदि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के षड्यंत्र को देखना हो, ताकतवर देशों की दादगीरी व उसका परिणाम देखना हो, तो यह फिल्म जरूर देखें | आपको कई बातें पता चल जाएंगी व आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे | जो पत्रकार खोजी, स्वंतंत्र तथा आलोचनामात्मक पत्रकारिता करना चाहते हैं , वे इस फिल्म को जरूर देखें |
                                       


Sunday, September 15, 2013

मिस्टर एंड मिसेस अय्यर : फिल्म समीक्षा

मिस्टर एंड मिसेस अय्यर : फिल्म समीक्षा

बैनर : एम जी डिस्ट्रीब्यूसन और टिप्स एक्सपोर्ट
निर्माता : एन वेंकटसन और रूपाली मेहता
निर्देशन : अपर्णा सेन
कहानी लेखक : अपर्णा सेन
संगीत : ज़ाकिर हुसैन
कलाकार : राहुल बोस, कोंकणा सेन शर्मा, भीष्म साहनी, सुरेखा सीकरी, सुनील मुखर्जी, अंजन दत्त, ईशा चौहान, निहारिका सेठ
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए 120 मिनट
रेटिंग : 3.5/5

                                          फिल्म की शुरुआत बच्चे के डरावने चेहरे से होती है | टेरर (भय), दुनिया में लगातार बढ़ता जा रहा है | दंगों के कारण, आतंकी हमलों के कारण, और भी कई कारणों से लगातार भय बढ़ता जा रहा है | इस फिल्म में सांप्रादयिक दंगों, प्रशासन का इन दंगों के कारण बेबस होना, धर्म का कट्टरपन, लोगों में डर की भावना को बखूबी दिखाया गया है और साथ ही साथ प्यार को भी बखूबी दिखाया गया है |
                                          सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, अचानक सड़क ब्लॉक होती है और बस दूसरे रास्ते की ओर मुड़ जाती है | अचानक पुलिस आती है और सबको बस के अंदर बैठने को कहती है | दंगें भड़क गए हैं | बस में एक व्रद्ध मुस्लिम जोड़ा बैठा होता है | जब दंगाई आते हैं तो एक व्यक्ति कहता है कि ये मुस्लिम हैं और वे मुस्लिम जोड़े को बाहर ले जाते हैं | अगले दिन सुबह में उसी बूढ़े व्यक्ति के दांत दिखाई देते हैं | सोचने पर मजबूर कर देने वाला यह द्रश्य यह दिखाता है कि सांप्रदायिक दंगों में हम हमारी मानवता, विवेक भूल जाते हैं | इसके बाद कहानी आगे बढ़ती है और मीनक्षी अय्यर और जहांगीर चौधरी में धीरे- धीरे बात-चीत शुरू हो जाती है |  
                                          कहानी शुरू होती है सांप्रादयिक दंगों से, लेकिन कहानी धीरे- धीरे प्यार में बदलती जाती है | यहाँ ऐसा लगता है कि अब मानो सब कुछ सामान्य सा हो गया है लेकिन अचानक फिर आग से एक बच्ची को बचाना, फिर मीनक्षी अय्यर के सामने रात में एक और की मौत |  फिर से यह लगने लगता है कि स्थितियाँ कब सामान्य होगी ?

                                     
  राहुल बोस और कोंकणा सेन ने बेहतरीन अभिनय किया है तथा फिल्म की सबसे अच्छी बात फिल्म की तारतम्यता लगातार बनाए रखना है | कुल मिलाकर यह फिल्म उम्दा है लेकिन एक बात है कि फिल्म का संदेश कहीं कहीं भटक जाता है |